china taiwan conflict upsc : चीन ताइवान जंग, जाने किसके साथ जाएगा भारत-अमेरिका

Shashikant kumar
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china taiwan conflict upsc: चीन और ताइवान ये एक ऐसा जंग जो किसी भी समय शुरू हो सकता है खासकर वो समय जब विश्व युद्ध का खतरा लगातार हो बढ़ रहा है उसी समय चीन – ताइवान बॉर्डर पर खामोशी है जो कि एक बड़े युद्ध से पहले का खामोशी भी हो सकता है। जैसा कि चीन का स्पष्ट लक्ष्य है कि 2027 तक ताइवान-चीन अपने साथ मिलाना चाहता है और चीन उसी लक्ष्य के तरफ़ बढ़ चल रहा है,और आज दौर में ये कहना कठिन नहीं है कि चीन इस लक्ष्य को हासिल कर लेगा। क्योंकि चीन लगातार ताइवान के फ्रंट पोजिशन और चीनी तट के आसपास मौजूद ताइवानी पोस्ट पर हमले करता रहता है, और उसपर कब्जा करने की धमकी देता रहता है।

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हालांकि अबतक जो चीजें आज से तीन साल के बाद लग रहा था वो अब ऐसा लग रहा है कि इसी साल हो सकता है। आप सोच रहे होंगे कि हम ऐसा क्यों कह रहे हैं तो आज़ हम इस पर विस्तृत रूप से आपको बताते हैं। 

क्या ताइवान कभी चीन का हिस्सा था?

ताइवान और चीन एक समय तक एक ही देश हुआ करता था। 1949 में जब चीनी राष्ट्रवादी पार्टी ने चीनी गृहयुद्ध में हारने के बाद, लगभग 12 लाख राष्ट्रवादी ताइवान भाग गये। चियांग काई-शेक और उनके जनरलों ने अगले साल ताइपे में अपनी राजधानी के साथ चीन गणराज्य की स्थापना की। वैसे चीन कम्युनिस्ट पार्टी ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया और अभी भी ताइवान को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का हिस्सा मानती है जबकि ताइवान खुद को रिपब्लिक ऑफ चाइना कहता है।

पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का नीति स्पष्ट है कि वन चाइना पॉलिसी यानी पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ताइवान को देश नहीं मानता है। आपको ये भी बता दें कि भारत भी वन चाइना पॉलिसी का समर्थन करता था लेकिन हाल दिनों में पीओके जिस प्रकार से चीन दखलअंदाजी करने लगा उसे देखने हुए भारत ने भी कई मौके पर ताइवान का खुलकर समर्थन किया और ताइवान के कंपनी भारत आने भी दिया वो भी बिना चीन से पुछे।

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वन नीति पर सोच 

हाल दिनों में भारत चीन के प्रति अपने नितियों में लगातार बदलाव कर रहा है उसी नीति तहत भारत लगातार ही ताइवान के साथ दोस्ती बढ़ा रहा है वहीं अमेरिका का बात करें तो वो भी वन चाइना नीति का पक्षधर रहा है। लेकिन असल मायने अमेरिका ताइवान को एक मार्केट समझता है,इसी कारण से अमेरिका ताइवान का सपोर्ट में खड़ा रहता है। 

इस समय विश्व में बस 15 देश है जो कि ताइवान को आधिकारिक तौर पर एक देश के तौर पर मान्यता देते हैं, जबकि कि संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतरराष्ट्रीय अंतर-सरकारी निकाय भी आधिकारिक तौर पर ताइवान को मान्यता नहीं देते हैं।

1950 में आपको ये जानकार हैरानी होगा कि भारत पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को और वन चाइना नीति मान्यता देने वाले गैर कम्युनिस्ट देशों में पहले नम्बर पर था।

ताज़ा विवाद चीन-ताइवान china taiwan conflict latest news

चीन-ताइवान का ताजा विवाद की शुरुआत होता है ताइवान की नयी सरकार के सपथ ग्रहण समारोह के साथ ही इस विवाद का शुरुआत हो जाता है। ताइवान के राष्ट्रपति ने सपथ लेते हुए साफ़ कहा कि चीन को अब युद्ध के धमकी देना छोड़ देना चाहिए इसी के साथ ही ड्रेगन को मिर्ची लगना तय था और हुआ भी वही। चीन अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन का निंदा की क्योंकि उन्होंने ताइवान नये राष्ट्रपति सपथ लेने के बाद शुभकामनाएं दे दी थी।

चीन चारो तरफ घेर लिया 

इस समय चीन का सेना चारों तरफ ताइवान को घेर चुका है। मिडिया रिपोर्ट ऐसी खबरें आ रहा है कि चीन अपने सरकारी चैनलों से लगातार ही देश के जनता को कह रहा है कि वो बड़े युद्ध के लिए तैयार रहें हैं। चीन का ऐसी तैयारी है कि मानों ताइवान और चीन युद्ध किसी भी समय शुरू हो सकता है, वो भी उस समय जब दुनिया बड़े युद्धो को झेल रहा है

ऐसी खबरें हैं कि रुसी राष्ट्रपति पुतिन ताइवान और चीन के युद्ध पिछे बड़ा कारण हो सकता है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इस दुनिया अमेरिका और पश्चिमी देशों का प्रभाव समाप्त हो रहा, इस बात को पुतिन बखूबी समझते हैं इसलिए पुतिन अपने कार्यकाल सबसे पहले विदेश दौरा चीन का किया और चीनी राष्ट्रपति से मिले शाय़द यहीं बोलें होंगे कि यही सही समय जब ताइवान को चाइना में मिला लिया जाए क्योंकि कोविड काल से अमेरिका प्रभाव लगातार समाप्त हो रहा है। बाइडेन प्रशासन ग़लत नीतियों कारण जो अमेरिका प्रभाव पहले हुआ करता था अब वो नहीं रहा है,और इसी साल अमेरिका में चुनाव हैं। ऐसा लग रहा है कि वो चुनाव ट्रंप जीत सकते हैं और अमेरिका के सबसे कमजोर राष्ट्रपति में गिने जाने वाले बाइडेन का विदाई होने जा रहा है और चीन को इसी बात का डर है कि अगर ट्रंप वापस आ जाते हैं तो फिर ताइवान चीन में मिलाना कठिन हो जाएगा इस समय अमेरिका चारों तरफ़ से घिरा इसी वजह से चीन ताइवान पर हमला करने जा रहा है।

अगर ताइवान – चीन के बीच युद्ध होता है तो अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन इस समय का सबसे बड़ा चुनौती आने वाला है। बाइडेन और अमेरिका रुख़ पर पुरा दुनिया का नज़र रहेगा। वैसे आपको बता दें कि अमेरिका, ताइवान को अपनी रक्षा मदद देने के लिए भी बाध्य है। अमेरिका भले ही बीजिंग की स्थिति को भी कबूल करता है कि ताइवान चीन का हिस्सा है। लेकिन उसने कभी द्वीप पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के दावे को पक्षधर नहीं रहा है और न ही स्वीकारा है।

वैसे इस समय दुनिया से अमेरिकी प्रभाव कम हो रहा है इसे अमेरिका के सभी दुश्मन बखुबी समझते हैं, इस समय दुनिया में एक नये वर्ल्ड ओडर तैयार हो रहा है जिस कारण से पश्चिम देशों और अमेरिका काफी परेशान जो अमेरिका एक समय दुनिया पर राज करता था वो अमेरिका अब कमजोर होते जा रहा है उसकी जगह भारत रूस और चाइना लेने लगा है नये वर्ल्ड ओडर में यहीं तीन महत्वपूर्ण प्रभाव रहेगा।

क्या भारत और ताइवान के दोस्त हैं?

 भारत – चीन का रिश्ता हम सबको मालूम है। हालांकि सबसे बड़ा सवाल है कि  चीन का दुश्मन देश ताइवान के साथ हमारा रिश्ता कैसा है? वैसे भारत पहला ग़ैर कम्युनिस्ट सरकार थी जो कि चीन के वन चाइना नीति मान्यता दिया हालांकि 1962 में चीन अपनी विस्तारवादी नीति तहत भारत पर धोखे वार किया उसके बाद से परिस्थिति बदलती रहीं हैं उसके बाद 1967 के युद्ध में हम ने चीन को हरा दिया था। 1990 के दौर से हमारा रिश्ता ताईवान के साथ सामान्य होता गया लेकिन अबतक इन दोनों देशों में कोई राजनयिक संबंध नहीं बना है। आज भी भारत आधिकारिक तौर पर वन चाइना नीति और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना को मान्यता देता है।

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शशिकांत कुमार युवा लेखक राजनीति, 2024 की रणभूमि पुस्तक के लेखक। पिछले कई चुनावों से लगातार ही सबसे विश्वसनीय विश्लेषक।।।
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