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Muharram 2024:तजिया क्यों निकाला जाता? ताजिए का इस्लाम धर्म से नहीं है कोई नाता

Muharram 2024

Muharram 2024:तजिया क्यों निकाला जाता? ताजिए का इस्लाम धर्म से नहीं है कोई नाताइस्लाम धर्म को मानने वाले लोगों का मोहर्रम का त्योहार अब आने वाला है।  इस दौरान भारत में इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग तजिया निकालते हैं। भारत के अलावा दुनिया में कोई देश नहीं है जहां मोहर्रम दिन तजिया निकाला जाता है। 

Muharram 2024

तजिया क्यों निकाला जाता?

आशूरा के दिन मुस्लिम समुदाय के लोग मातम मनाते हैं। इसके अलावा आज के दिन ताजिया और जुलूस निकाले जाते हैं जिसमें लोग इमाम हुसैन और उनके साथ शहीद हुए लोगों को याद कर खुद को जख़्मी भी कर लेते हैं। ताजिया हजरत इमाम हुसैन की कब्र के प्रतीक के रूप में होता है।

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ताजिए का मतलब क्या होता है? और कैसे बनाएं जाता?

बाँस की कमाचिय़ों पर रंग-बिरंगे कागज, पन्नी आदि चिपका कर बनाया हुआ मकबरे के आकार का वह मंडप जो मुहर्रम के दिनों में मुसलमान सुनी लोग हजरत-इमाम-हुसेन की कब्र के प्रतीक रूप में बनाते है और दसवें दिन जलूस के साथ ले जाकर इसे दफन किया जाता है।

ताजिया के अंदर क्या रहता है?

इराक़ में हज़रत इमाम हुसैन का मकबरा है ,उसी मकबरे में की तरह से तजिया बनाया जाता है और जूलूस निकाला जाता है। आशूरा इस्लाम धर्म का कोई त्यौहार नहीं है बल्कि कि मातम का दिन है। जिसमें शिया और सुन्नी दोनों ही 10 दिनों तक शोक मनाते हैं।

कत्ल की रात में क्या होता है?

कत्ल की रात का अर्थ होता है कि मोहर्रम का नवमी तारीख को हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के एक दिन पहले के रात्रि होता है। यही कारण दुनिया भर के मुसलमान इस रात को कत्ल की रात तौर पर याद करते हैं।

मुहर्रम पर मुसलमान खुद को क्यों मारते हैं?

मुहर्रम में मुसलमान क्यों ख़ुद को मानते हैं इसका जवाब है कि हज़रत हुसैन के शहादत की याद में मोहर्रम मनाएं जाता है। इस दिन हजरत इमाम हुसैन के फॉलोअर्स खुद को तकलीफ देकर इमाम हुसैन की याद में मातम मनाते हैं। इसलिए वो स्वयं कष्ट देकर हज़रत हुसैन के शहादत याद करते हैं।

2024 में तजिया कब है?

इस्लामिक कैलेंडर के नया साल यानी 1446 हिजरी का पहला दिन 8 जुलाई को शुरू होता है। मुहर्रम के महीने के 10 वें तारीख को मुहर्रम के महीने की 10 तारीख को भारतीय उपमहाद्वीप यानी बांग्लादेश और पाकिस्तान में ताजियादारी की जाती है।इस अवसर पर जहां सुन्नी मुसलमान इमाम हुसैन के इराक के कर्बला स्थित मकबरे की आकृति की बांस की खिम्चियों और चमकीले पेपर से बनी ताजिया निकालते हैं। वहीं शिया मुसलमान अलम निकालते हैं और इमाम हुसैन की शहादत की याद में मातमी जुलूस निकालने के साथ गम मनाते हैं।इस बार मोहर्रम 17 जुलाई को हैं इस दिन इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग तजिया जूलूस निकालें गे।

तजिया इस्लाम धर्म से कोई नाता नहीं 

तजिया का इस्लाम धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि भारतीय महाद्वीप अलावा किसी और जगह पर तजिया नहीं निकलता है।तजिया का इस्लाम धर्म से कोई संबंध नहीं बल्कि ये पुर्ण रुप से भारतीय महाद्वीप का परंपरा है। जो भारतीय उपमहाद्वीप यानी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के अलावा किसी और इस्लामी देश में ये परंपरा चलन में नहीं है।ताजिए की शुरुआत भारत में बरसों पहले तैमूर लंग बादशाह (8 अप्रैल 1336 – 18 फरवरी 1405) के जमाने में हुई थी‌‌। वास्तव तैमूर लंग शिया संप्रदाय से थे। ऐसा कहा जाता है कि वह आशूरा के मौके पर हर वर्ष इमाम हुसैन के मजार पर जियारत (दर्शन) के लिए जाते थे, लेकिन बीमारी होने की वजह से एक वर्ष वह कर्बला नहीं जा पाए। उन्हें हार्ट का समस्या था इसलिए हकमिनो ने यात्रा के लिए मना किया। ऐसे में बादशाह सलामत को खुश करने के लिए दरबारियों ने ऐसी योजना बनाई। हालांकि इससे बादशाह सलामत खुश हो जाए। उसके बाद दरबारियों ने उस वक्त के कलाकारों को इकट्ठा कर उन्हें इराक के कर्बला में स्थित इमाम हुसैन के रौजे (मकबरे) की आकृति बनाने का आदेश दे  दिया। उसके बाद कुछ कलाकारों ने बांस की खिम्चियों से इमाम हुसैन के मकबरे का ढांचा तैयार किया। इसे तरह-तरह के फूलों से सजाया गया। इसी को ताजिया नाम दिया गया। इस तरह से भारत में पहली बार 801 हिजरी संवत को तैमूर लंग के महल में उसे रखा गया। देखते ही देखते तैमूर के ताजिए की धूम पूरे देश में मच गई। देश-भर के राजे-रजवाड़े और श्रद्धालु जनता इन ताजियों की जियारत (दर्शन) के लिए आने लगे इसी साथ इस परंपरा की शुरुआत भारतीय महाद्वीप हो जाता है।

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